इक समुन्दर सा उमड़ रहा है
सुर्ख इस रूह की गहराइयों में
इक बादल सा घुमड़ रहा है
दिल-ए-गुस्ताखी की बक्शीश तो
उसके पास भी न थी कभी
अब भी जो साकित इस ज़िन्दगी में
साँसे कुछ मढ़ रहा है
कसक सी जगी थी इसमें
कुछ चंद लम्हा पहले जो
उस कसक के एहसास को
आज फिर वो टला रहा है
मेरे इश्क के जुनूँ से शर्मा के
कल शाम जो ढल गया था
बेशर्मी की तेज़ी से अब
पहचां को जला रहा है
जाओ न करेंगे अब
गिला कोई यूँ तुमसे
उन लबों के निशान अब भी
दिल-ए-खामोश भुला रहा है
पर इस जिस्म के हर ज़र्रे पर
उन लबों के हैं कुछ ज़ख्म
उन ज़ख्मों का दर्द अब भी हमें
पल पल यूँ रुला रहा है..
पल पल यूँ रुला रहा है






