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Saturday, July 30, 2011

राँझा


कल देर शाम घर रोशन कर
हम राह देख बस रह गये
कुछ मोम की बस एक बाती से
हम आँख सेक सब सह गये

अब नींद से छुपते कब तक हम
उस चाँद ने हमको सुला दिया
और संग थे हम जो सपनों में
सुबह ने बस फिर रुला दिया

अब देर न कर, बस घर आजा
अरनब में कश्ती डोल रही
पल पल की ये तन्हाई भी
हँस हँस हमसे कुछ बोल रही

तुम बिन कितने दिन बीत गये
ऐसी भी क्या मजबूरी है
इतना भी हमको न तड़पा
कुछ ही मीलों की दूरी है

जब साथ में होगा तू दिलबर
जग से राँझा लड़ जायेगा
और इश्क के रंक से आलम का
ज़र्रा ज़र्रा भर जायेगा